वो ख्वाब जिनको तराशा था मेरी आँखो ने,
कल्पनाओ के चमकीले अँधेरो मे,
सुलगते, काँपते, खामोश आँसुओ की तरह,
झलक रहे है मेरी ज़िन्दगी की पलको मे !
इन आँसुओ को भी देकर कुछ चमक,
तुम्हारी रूह मे उतरता जाता हूँ,
मै रिसता ज़ख्म हूँ मगर तुम्हारे लिये,
खुशनुमा फूलो से गीत गाता हूँ !
तुम्हारी खुश्क आँखो मे चमक लाने को,
निचोडता हूँ मै इन्द्रधनुष के रंगो को,
पिला के अपने मुस्कुराते ज़ख्मो का लहू,
निखारता हूँ तुम्हारी हसीन उमंगो को !
मै अपने साज़ के नग्मो की नर्म लहरो मे,
तुम्हारे चेहरे की वीरानगी डुबोता हूँ,
मगर खुद अपनी जवानी की आर्ज़ुओ पे,
तुम्हारे बाद अकेला ही छुप के रोता हूँ !!
तुम्हारे बाद अकेला ही छुप के रोता हूँ !!!!
Tuesday, July 31, 2007
Sunday, July 29, 2007
नई रोशनी
क्यूँ मेरी अंगुलियाँ थकने लगी है?
क्यूँ मेरे लब थरथरा रहे है?
आज मै अपने गीतो से शर्मा रहा हूँ,
और मेरे गीत मुझसे शर्मा रहे है..
वो गीत मुझे आज बेज़ान लगते है....
जो कि मेरे दिल के जज़्बात थे,
जिन्हे कोरे कागज़ पर मैने उकेरा था,
और उस क़लम को भी तोड देना चाहता हूँ,
जिसने लोगो के दिल के तारो को छेडा था,
आज मेरे हाथो मे क्रांति की मशाल दे दो..
.जिसकी रोशनी से,
मै हटा दूँ घने स्याह अँधेरो को,
और अपने इस दिल की तडप से आज फिर,
उगा दूँ नई सुबह और सवेरो को...
अब तो दिल का आलम यही है...
कि सारे आलम पे छा जाना चाहता हूँ,
करके क़ुर्बान ये जीवन इस ज़मी के लिये,
इक नई रोशनी जलाना चाहता हूँ...!!!!
क्यूँ मेरे लब थरथरा रहे है?
आज मै अपने गीतो से शर्मा रहा हूँ,
और मेरे गीत मुझसे शर्मा रहे है..
वो गीत मुझे आज बेज़ान लगते है....
जो कि मेरे दिल के जज़्बात थे,
जिन्हे कोरे कागज़ पर मैने उकेरा था,
और उस क़लम को भी तोड देना चाहता हूँ,
जिसने लोगो के दिल के तारो को छेडा था,
आज मेरे हाथो मे क्रांति की मशाल दे दो..
.जिसकी रोशनी से,
मै हटा दूँ घने स्याह अँधेरो को,
और अपने इस दिल की तडप से आज फिर,
उगा दूँ नई सुबह और सवेरो को...
अब तो दिल का आलम यही है...
कि सारे आलम पे छा जाना चाहता हूँ,
करके क़ुर्बान ये जीवन इस ज़मी के लिये,
इक नई रोशनी जलाना चाहता हूँ...!!!!
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