Friday, August 3, 2007

बचपन के दिन


काश लौटा सकता, उन बचपन के दिनो को
वो मेरे बचपन के दिन
माँ की गोद मे उसके आँचल से लिपटता
लोरी सुनकर नन्हे ख्वाबो को समेटता
घुटनो के बल घर मे घूमता और फिरता
तुतला के बोलता और गिरता सम्भलता
बडो की स्वार्थी दुनिया से बहुत दूर
अपनी नन्ही सी दुनिया मे सबको बुलाता
मासूम सवालो से सबको उलझाता
आज सोचता हूँ क्यो बडा हो गया हूँ ?
मै भी इसी स्वार्थी दुनिया मे खो गया हूँ
थक जाता हूँ रोज़ खुद को खोजते-खोजते
रो देता हूँ दिल मे ये सोचते-सोचते
काश लौटा सकता, उन बीते दिनो को
मेरे उन बचपन के दिनो को..........

1 comment:

Sangeeta said...

bahut khoob
sangeeta