Tuesday, July 27, 2010

हुनर

मै इस गम के समुद्र से गुज़र क्यूँ नही जाता,
मरना जब हर हाल मे है तो मर क्यूँ नही जाता !!
ये वक़्त के हाथो मे जो महकता हुआ खंज़र है,
ये खंज़र कलेजे मे इक साथ उतर क्यूँ नही जाता !!
यूँ ही अपनी ज़िन्दगी को लिये फिर रहा हूँ मै,
मै ज़िन्दगी को लेकर अब ठहर क्यूँ नही जाता !!
ज़िन्दगी को लोग गुज़ार देते है गिरगिट की तरह,
शुक्र है खुदा मेरे यह हुनर मुझको नही आता !!

Monday, December 24, 2007

Mahngaa Padaa !

हमको अपने आप से मुँह मोडना महँगा पडा,
अजनबी लोगो से रिश्ता जोडना महँगा पडा !!
हम गुलेलो के शहर मे बन के रहते आईना,
हमको लेकिन आईने को फोडना महँगा पडा !!
हम मुखौटे देखने के उम्र भर आदी रहे,
पर हमे अक्सर मुखौटा ओढना महँगा पडा !!
फल गिरेंगे शाख से हमको यही उम्मीद थी,
पर समूचे पेड को झकझोरना महँगा पडा !!!

waqt ki raftaar

एक दिन वक़्त से पूछा मैने,
भाई इतना तेज़ क्यूँ चलते हो?
चन्द खुशियाँ हमारे साथ न रह जाये,
क्या इसलिये जलते हो?
अरे ! कुछ दिन इन्हे हमारे साथ रहने दो,
कुछ समय के लिये ही सही,
मुझे इनके साथ बहने दो,
तुम्हारा क्या चला जायेगा,
मेरा मन बहल जायेगा,
आज तो मेरी बात मान ही जाओ,
थोडा सा रुक जाओ, यूँ न सताओ,
हँसने लगा वक़्त ये कहते हुए
जीना तो पडेगा सब कुछ यह सहते हुए,
अरे ! जो अस्थायी है उसके लिये रोते हो,
और स्थायित्व को खोते हो,
अरे भाई !खुशियाँ तो चन्द लम्हो के लिये आती है,
और यादे ज़िन्दगी भर साथ निभाती है,
मै तो अपनी ही गति से चलता जाऊँगा,
तुम्हारे निवेदन से भी रुक न पाऊँगा,
मेरी गति मे से ही कुछ लम्हे चुरा लो,
कुछ पल उनके साथ रहकर,
फिर उन्हे अपनी यादे बना लो,
फिर उन्हे अपनी यादे बना लो......!!!

Badan ko Apne Samete

बदन को अपने समेटे हुए कहाँ चले ऐ दोस्त !
तेरी गरीबी, तेरी जवानी और ये उल्फत
देहात मे जाडे की चाँदनी की तरह
सन्नाटा छाया होजैसे संगीत के आँचल मे
अलाव जलते हो ज्यो झोपडो की समाधि मे
उदास चेहरे पर मजबूरी का अफसाना
नज़र थकी हुई खुशहाली का पैमाना
बदन को अपने...................
तेरे शौक पर तेरी गरीबी इक गुनाह है
अभी तो तुझको कई रात यूँ ही जलना है
और खुशियो के रास्तो तक पहुँचने के लिये
इन सूनी-सूनी पगडंडियो पर चलना है
बदन को अपने समेटे...................
लहरा के नीली झील मे ढलता है शाम को,
सूरज का रंग रूप बदलता है शाम को !!
हमसे हो एक गरीब के आँगन मे रोशनी,
सिक्का हमारे नाम का चलता है शाम को !!
मेहनत की आँच मे तपे मजदूर की तरह,
सूरज का जिस्म रोज़ पिघलता है शाम को !!
हासिल है उसको जादूगरी मे बडा कमाल,
मुट्ठी मे चाँद ले के निकलता है शाम को !!
उसके नसीब मे नही मंज़िल की रोशनी,
जो आदमी सफर मे निकलता है शाम को !!
लाखो घरो मे रोज़ की मशक़्क़त के बावज़ूद,
चूल्हा चिराग की तरह जलता है शाम को !!!

kya Wo Bhi?

क्या वो भी रोती होगी, बिछड कर मुझसे?
जब बेक़रार कर देती होगी याद मेरी,
क्या वो भी आईने मे देख कर,
अपने शिकवे कहती होगी मुझसे?
अपनी दुआओ मे क्या मांगती होगी वो भी,
पहली दुआ सिर्फ मिलने की मुझसे?
न देती है दोस्ती, नाम हमारे रिश्ते को,
और न नाम लेती है वो उल्फत का,
फिर न जाने क्या चाहती है वो मुझसे?
खामोश है खुद वो, न कहने देती है मुझे कुछ
फिर वो क्या है, जो वो सुनना चाहती है मुझसे?
न उसे मेरी नसीहत चाहिये, न कोइ मशवरा,
फिर क्यूँ वो बेझिझक लिखती है,
गुनाह अपने खत मे मुझे?