Monday, December 24, 2007

लहरा के नीली झील मे ढलता है शाम को,
सूरज का रंग रूप बदलता है शाम को !!
हमसे हो एक गरीब के आँगन मे रोशनी,
सिक्का हमारे नाम का चलता है शाम को !!
मेहनत की आँच मे तपे मजदूर की तरह,
सूरज का जिस्म रोज़ पिघलता है शाम को !!
हासिल है उसको जादूगरी मे बडा कमाल,
मुट्ठी मे चाँद ले के निकलता है शाम को !!
उसके नसीब मे नही मंज़िल की रोशनी,
जो आदमी सफर मे निकलता है शाम को !!
लाखो घरो मे रोज़ की मशक़्क़त के बावज़ूद,
चूल्हा चिराग की तरह जलता है शाम को !!!

1 comment:

ritusaroha said...

bahut acha likha hai.......