Monday, December 24, 2007

waqt ki raftaar

एक दिन वक़्त से पूछा मैने,
भाई इतना तेज़ क्यूँ चलते हो?
चन्द खुशियाँ हमारे साथ न रह जाये,
क्या इसलिये जलते हो?
अरे ! कुछ दिन इन्हे हमारे साथ रहने दो,
कुछ समय के लिये ही सही,
मुझे इनके साथ बहने दो,
तुम्हारा क्या चला जायेगा,
मेरा मन बहल जायेगा,
आज तो मेरी बात मान ही जाओ,
थोडा सा रुक जाओ, यूँ न सताओ,
हँसने लगा वक़्त ये कहते हुए
जीना तो पडेगा सब कुछ यह सहते हुए,
अरे ! जो अस्थायी है उसके लिये रोते हो,
और स्थायित्व को खोते हो,
अरे भाई !खुशियाँ तो चन्द लम्हो के लिये आती है,
और यादे ज़िन्दगी भर साथ निभाती है,
मै तो अपनी ही गति से चलता जाऊँगा,
तुम्हारे निवेदन से भी रुक न पाऊँगा,
मेरी गति मे से ही कुछ लम्हे चुरा लो,
कुछ पल उनके साथ रहकर,
फिर उन्हे अपनी यादे बना लो,
फिर उन्हे अपनी यादे बना लो......!!!

1 comment:

Amit K Sagar said...

बहुत ही सुन्दर रचना साहब. लिखते रहिये-रुबू कराते रहिये...अच्छी रचनाओं से गुज़रना हमें बेहद सुकून देता है. शुक्रिया.
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ultateer.blogspot.com