Monday, December 24, 2007

Badan ko Apne Samete

बदन को अपने समेटे हुए कहाँ चले ऐ दोस्त !
तेरी गरीबी, तेरी जवानी और ये उल्फत
देहात मे जाडे की चाँदनी की तरह
सन्नाटा छाया होजैसे संगीत के आँचल मे
अलाव जलते हो ज्यो झोपडो की समाधि मे
उदास चेहरे पर मजबूरी का अफसाना
नज़र थकी हुई खुशहाली का पैमाना
बदन को अपने...................
तेरे शौक पर तेरी गरीबी इक गुनाह है
अभी तो तुझको कई रात यूँ ही जलना है
और खुशियो के रास्तो तक पहुँचने के लिये
इन सूनी-सूनी पगडंडियो पर चलना है
बदन को अपने समेटे...................

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