हमको अपने आप से मुँह मोडना महँगा पडा,
अजनबी लोगो से रिश्ता जोडना महँगा पडा !!
हम गुलेलो के शहर मे बन के रहते आईना,
हमको लेकिन आईने को फोडना महँगा पडा !!
हम मुखौटे देखने के उम्र भर आदी रहे,
पर हमे अक्सर मुखौटा ओढना महँगा पडा !!
फल गिरेंगे शाख से हमको यही उम्मीद थी,
पर समूचे पेड को झकझोरना महँगा पडा !!!
7 comments:
bahut laajwaab likha hai,
ise padhna mahanga nahi,
kafi dilkash ban pada.......
हम गुलेलो के शहर में बन के रहे आईना
दीपक जी बहुत सुन्दर रचना है
bahut hi khoobsurat rachna..
लाजवाब!
फल गिरेंगे शाख से हमको यही उम्मीद थी,
पर समूचे पेड को झकझोरना महँगा पडा !!!
महावीर शर्मा
हमको अपने आप से मुँह मोडना महँगा पडा,
अजनबी लोगो से रिश्ता जोडना महँगा पडा !
bhot sunder....Bdhai..!!
फल गिरेंगे शाख से हमको यही उम्मीद थी,
पर समूचे पेड को झकझोरना महँगा पडा !!
khubsurat panktiyaan....
par kahi kahi....aisa laga jaise kayal ko repeat kiya jaa raha hai...main ek adna sa kavi hu.....maaf kijiyega, but mujhe laga jaise.....ek hi baat baar baar kahi jaa rahi hai.....
varna jis dhang se aapne mujhe jhakjhora...anand aa gaya
khubsurat rachna
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